*गुलजार साहब की एक कविता*🌷


*जिन्दगी की दौड़ में,*
*तजुर्बा कच्चा ही रह गया…।*
*हम सीख न पाये ‘फरेब’*
*और दिल बच्चा ही रह गया…।*
*बचपन में जहां चाहा हँस लेते थे,*
*जहां चाहा रो लेते थे…।*
*पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए*
*और आंसुओ को तन्हाई..।*
*हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अन्दाज़ से*
*देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में.*
*चलो मुस्कुराने की वजह ढुंढते हैं..*
*जिंदगी तुम हमें ढुंढो…*
*हम तुम्हे ढुंढते हैं..!!*
     🍃🍃 *खुश रहिये* 🍃🍃
     😊 *सदा मुस्कराते रहिए!*😊
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